🌷 आँखों से जो छलका…


🌷 आँखों से जो छलका…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले

आँखों से जो छलका…
वो सिर्फ़ बूँद, पानी का न था…

देख कर प्रिय मित्र सुदामा…
कान्हा का मन मित्रता-का-झरना,
यूंही उमड़ पड़ा, नैनों के द्वारा…
वो बूँद, मात्र पानी का न था…

कौरवों के राज़ दरबार में…
छ़ल-कपट से द्युत में हरायी गईं,
महारानी द्रौपदी पर घोर अन्याय…
श्रीगिरिधरने संभाल ली नारी की लज्जा,
श्रीकृष्ण ने कर ली स्त्रीत्व की सुरक्षा…

दानव-राज़-हिरण्यकश्यपू द्वारा,
ख़ुद ही के सुपुत्र, मासूम-भक्त-प्रल्हाद…
उस पर होता हुआ घोर अत्याचार देख,
श्रीकृष्ण के हृदय से अमृत बरसा…
वो बूँद, मात्र पानी का कैसे हो सकता…?

किसी भी तरह का शोषण देखकर,
मस्तिष्क में दहकता हुआ अंगार,
जब श्री आँखों से छ़लकता है…
वो मात्र एक बूँद पानी, नहीं होता…
वो ही दया-करूणा-का-महासागर है…

🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆

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