
🌷 तक़दीर के मारे…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
ज़िन्दगी में इन्सान बेबस सा हो जाता है…
लाखों कोशिशों के बावजूद हार जाता है…
काफ़ी बार तक़दीर यूंही झांसा दे देती है,
वो सुध-बुध खोकर हक्का-बक्का होता है…
सातवें आसमान से गिरें तक़दीर के मारे…
और फ़िर आ कर लटकें खजूर के पेड़ पे…
अब तक जो ज़िन्दगी बिताईं जन्नत लगी…
फ़िर बदलकर जहन्नम सी हैरानी हो गयी…
सातवें आस्मां से गिरे हुए, पत्तों की भांति…
वो तितर-बितर होके बिखरती ही जा रही…
डूबने वाले को तिनके का सहारा काफ़ी है,
कभी कभी ढ़ूंढ़ के भी नसीब नहीं होता है…
ऐसे तक़दीर के मारे लोग, करें तो क्या करें ?
किसी जन्म के कर्मों के फेरे से कौन बचाएं ?
किसी दूसरे को सलाह देना आसान होता है…
जब शिकारी ख़ुद शिकार हो तो कौन बचाएं ?
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆















