
🌷जीवन की राह…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
कभी कभी लगता है सब कुछ बदल रहा है
ख़्वाब जो देखें, पूरे होके भी हैं अधूरे-अधूरे
जीवन की राह, कहीं ग़लत तो नहीं मुड़ी है ?
कल तक ज़िन्दगी हसीं सपने सी लगती थीं
रात क्या बीती, रंगों की बारात ख़त्म हो गई
जीवन की राह, कहीं ग़लत तो नहीं है मुड़ी ?
कल तक हरी-भरी धरती जन्नत की थी परी
रात क्या बीती अब लग रही उजड़ीं-उजड़ीं
जीवन की राह, कहीं ग़लत तो नहीं है मुड़ी ?
कल तक जो अपने बन कर साथ निभाते थें
रात क्या बीती अंजान बने तमाशा देख रहे हैं
शायद जीवन की राह, कहीं तो ग़लत मुड़ी है...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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