
🌷अंधेरे पिघलते हैं...
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
अंधेरे पिघलते हैं सूरज की रोशनी के सामने…
गरजने वाले बादल, कभी देखें हैं बरसते हुएं ?
सोच है मजबूत इतनी आस्मान को छूनेवाली…
तब झूठी दीवारें-झरोखें, टूटकर ढ़ेर होंगी ही…
बाते अगर हैं बुजदिल, तो बिखर ही जातीं हैं…
इरादे हैं फ़ौलादी तो हिम्मत ख़ुद-ब-खुद आएं…
अहम् से भरें रिश्ते-नाते ज्यादा देर नहीं टिकते…
शीशे-के-दिल आपसी टक्कर से टूट ही जाते हैं…
ग़मों के पहाड़ तलें दबे रहने से क्या फायदा ?
ज़िन्दगी जीने के लिए चाहिए मजबूत कलेजा…
जीवन के दौरान, आँधी आएं या फ़िर तुफ़ान…
सीना ताने मुक़ाबला करेंगे, चेहरे पर मुस्कान…
छिड़ गई जंग ज़िन्दगी की हम चाहे या न चाहें…
पल-पल बीतता जाएं, हम कुछ करें या न करें…
कांधे से कांधा मिलाकर हम साथ निभाते हुएं,
जिएंगे मिल-जुलकर, इन्सानियत-निभाते-हुएं…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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