
कविता : 🌷" दर्प की झीनी चादर में "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
अक्सर हम छिपकर बैठते हैं
अपने दर्प की झीनी चादर में...
बड़े आराम से देखते रहते हैं
सत्य को झूठ में, लिपटे हुए...
आसानी से हज़म कर जाते हैं
दुनिया की हर दोहरी चाल को...
आंखों पर पट्टी बांधे हुए हम,
फंस जाते हैं अपने ही जाल में...
"गिरें तो भी टांग ऊंची"कहते हैं
दंभ में दबे सत्य को झूठलाते हैं...
दरअसल सही और ग़लत बात में
फ़र्क तो सिर्फ नजरिए का ही है...
किसी मासूम का भला हो जाता हो
तो झूठ भी सच से कतई कम नहीं...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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