
कविता : 🌷 "पलकें बिछाएं..."
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
शाम हुई तबसे ही बरस रही है रात भी...
कबसे घड़ियां गिन रहे चांद के आने की...
बदलीं की चादर ओढ़कर है वो छुपा हुआ,
गुमसुम सा चंद्रमा, टुकुर-टुकुर देखता हुआ...
किसी रोज़ ख्वाब में चांद को तनहा पाया,
फ़िर चांदनी को देख के हल्के से मुस्कुराया...
जो मन के राग-रंग हैं, चेहरे पर छा जातें हैं...
फलक पर वो ही फ़िर इन्द्र-धनु बनें दिखतें हैं...
निगाहें जिस तरफ़ है, इशारा कर ही देती हैं...
पलकें बिछाएं, हाथ जोड़े आराधना होती है...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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