
🌷 'स्थितप्रज्ञ' की तरह अटल…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
सालों साल मौसम बदलते हैं…
लोग भी रंग-रूप बदल लेते हैं…
मानो गिरगिट के रंगों के जैसे…
हवा के झोंकों के साथ ही साथ,
पूरी-पूरी दुनिया भी घूम जाती है…
लोग चेहरे पे चेहरे लेकर जीते हैं…
धरती पे वटवृक्ष इस तरह खड़ा,
कोई ऋषि-मुनी दे रहा हों पहरा…
आंधी-तूफानों से, कभी ना डरा…
जोरों-शोरों की बारिश हो जाएं,
धरती पे चाहे कुछ भी हो जाए,
चाहे अकाल पड़े या बाढ़ आएं…
बरगद तो टस से मस नहीं होता…
ना जानता वो सूखना या झुकना
'स्थितप्रज्ञ' की तरह अटल रहता…
वक़्त से ऐसी टक्कर देने वाली,
चाहिए मजबूती, वटवृक्षों जैसी…
विशाल निराकार अंबर के जैसी…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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