
कविता 🌷: " चाहतों का सिलसिला "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
एक आधी-अधूरी इच्छा कबसे पनप रही है
हृदयके कितने-कितने अनदेखे कोने-कोनेमें...
कुछ-न-कुछ छिपा के रखा हुआ, एक-एक में
इक अनोखी ख़ामोशी, भला क्यों पल रहीं है...
के जिसका नहीं है, कोई भी आगा या पीछा
मन तो होता ही है चंचलता से पूरा-पूरा भरा...
कभी वो हो जाता है बिल्कुल वानरों के जैसा
कभी इस टहनी पे, तो कभी छतपे टंगा हुआ...
अंजान ऐसे बनता है, कि कुछ भी ज्ञात नहीं
आजकी तारीख में कौन जाने उसकी गहराई...
वो होता है महासागरों से भी कईं गुना गहरा
और झीलों के जैसी स्थिरता में, ठहरा हुआ...
एकबार कुछ थान लें, तो कठीन बने वज्र सा
गर करुणासे भरें तो मृदू होता, मक्खन जैसा...
जो भी चाहों उससे सौ गुना अधिक है मिलता...
फ़िर भी चाहतों का सिलसिला यूंही शुरू रहता...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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