
कविता : 🌷 " वक्त की करवटें "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
लड़कपनमें जो मासूमियत से थीं भरी-पूरी
वो वक्त की सुहानी करवटें याद हैं आज भी
शीशे में भरें हुए इत्र की तरह वे हैं सुगंधित
हृदय के सात-तल में बिल्कुल भी सुरक्षित…
किशोरावस्थामें वक्तने जैसे ही करवट बदली,
हर पल, हर लम्हा यूंही ख़्वाबों में खोयी-खोयी…
युवावस्थामें सदा गालोंपे खिलें गुलाब लिए,
साल बीतते गएं, खिल-खिलाकर हंसते हुए…
वक्तने फ़िर एक बार करवट बदल ही डालीं
जीवन-साथी-संग चांदनी रातें हुई उजलीं-उजलीं…
बचपन का गुड्डा-गुड्डी का खेल, सच में खेली…
सूरज उगता-ढलता है वैसे उम्र भी बढ़ती गई…
देखते-देखते वक्त ने फ़िर से करवट बदल ली
घर-गृहस्थी के साथ-साथ भक्तिमें लीन हो गई…
पोते-पोतियों के संग फ़िर दुबारा छोटी-सी हुई…
इक अनोखे अंदाज़ में वक्त ने यूं करवटें बदली…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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