
कविता : 🌷अब इंतज़ार है...
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
अंधियारी सी रात तो अब ढंल ही चुकी है...
बस्स, अब इंतज़ार है सुबह के किरणों का...
उमड़ते-घुमड़ते जा रहें हैं पल-पल शाम के...
साये भी गायब हो गएं यूं इंतज़ार करते हुए...
कबसे खड़े सुख-दुख के किनारे आंखें बिछाएं…
के सुबह जल्दीसे आएं साथ-साथ किरणें लाएं
लौट कर आने वाले हैं, वो सुकून से भरें लम्हें...
इंतज़ार करते रहें, बरसों से सुने उनकी आहटें...
गगन में हंसता-खेलता हुआ सितारोंका कारवां...
क्षितिज पे हल्की सी हलचल मचाते हुए चला...
चांद भी चांदनी से आंख-मिचौली खेलता हुआ,
आख़िर उम्मीद पर तो टिकी हुई है सारी-दुनिया...
हरेक धड़कन चल रही है, किसी के इंतज़ार में...
रूठी हुई साँसें रूकती नहीं सुकून की तलाश में...
निंद की आगोश में ही, सारा-का-सारा जहां है...
फ़िर भी दिलका कोना-कोना जगमगा उठता है...
यूं नटखट से अंदाज में चंद्रमा है निहारता हुआ...
शाय़द उसे इंतज़ार है, उगते सूरज से मिलने का...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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