
🌷 मासूम-सी रोशनी…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
यूं तो गिले-शिकवे होते रहते हैं…
ज़माने से लड़-लड़ के जीते हुए…
सुबह से लेकर शाम फ़िर से रात…
ज़िन्दगी भी खेलती है साथ साथ…
किस्मत की बात है उम्मीदों पर…
अंजाम देने हेतु, सोचेंगे पल-भर…
ताल्लुक रखें या फ़िर तोड़ ही दें,
यादें तो रह जातीं हैं यूं ज़ख्मों पे…
तक़दीर में जो हों, भुगतना पड़ें है…
फ़िर क्यूं ना जीएं, हम सीना-तानें…
कोई हो महाराजा, कोई महारानी…
पुराने पन्नों में, छुपी हुई जिंदगानी…
हर दिन भोर लाएं मासूम-सी रोशनी…
हर आशा की है एक नई-नई कहानी…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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