
🌷 मुस्कुराता हुआ शुक्र-तारा…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
शब्दों में ख़ामोशी, अर्थ पूर्ण सी गहराई
बाहर था शोरगुल, दिल में मायूसी छाई…
कहने को बहुत कुछ पर वक़्त की कमी
आँखों पर जंजीरें भी क़स कर बांधी गईं…
मन पर बेहद सन्नाटा सा था, छाया हुआ
होठों पर आते-आते ठिठुरन से भर गया…
जब चल ही पड़ें, कांटों से झुलसते हुएं…
दिशा-हीन हो गये थे पथ को ढूंढ़ते हुएं…
ठंड का साथी, गहरा-अंधेरा चहुं-ओर था…
मुश्किलों से जूझने का था पक्का इरादा…
आशाएं लेकर जब आस्मां की ओर देखा,
नज़र आया, वो मुस्कुराता हुआ शुक्र-तारा…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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