
🌷आराधना…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
सदियों से धरती को 'मैया-माता' का दर्जा दिया है,
वो शत-प्रतिशत सही और कमाल का उचित ही है
जब जब कोई बीज ज़मीन में गाड़ दिया जाता है,
वो नन्हे बोए हुए बीज को बहलाने में लग जाती है
सालों साल तक प्यार-ममता से उसे संभालती है…
बारिश की रिमझिम-फुहारों से, धरा उसे नहलाएं
कड़ी धूप से उसे बचाने में स्वयं वो गीली बनी रहें…
हवा के झोंकों का मानों झूला बनाकर उसे झुलाएं
बरस-बरस से जंग लड़ाएं सिर्फ बेबस बीज के लिए…
आख़िर चैन मिलें, जब जड़ों की जगह वो बना पाएं
बिना झिझके इतनी लगन से कौन करें किसके लिए ?
सिर्फ एक मां ही अपने आप को भुलाके ये कर सकें
समय चाहे कितना भी क्यों न लगे वो जूट ही जाती है
उसकी मेहनत लहलहाते खेतों के रूप में रंग आ जाएं
धरती माता दिन-रात काम करते हुए हमारा पालन करें
अनाज उगाके सब जीवों के मुंह में वो निवाला डाल दें
बीज को दरख़्त बनाने में धरा को जब सफ़लता मिलें
बिना-रुके बिना-थके बरसों की आराधना सफ़ल होवे
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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