
🌷ज़िन्दगी मिलेगी ना दोबारा…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जाने-अनजाने-हम सोचते हैं मन-ही-मन में…
चलो, अरमानों का घरौंदा बनाने में लगे रहें…
ख़्वाबों को बुनने में ही मश्गूल से हो जाते हैं…
इतने की ज़िन्दगी जीना भी, भूल से जाते हैं…
फ़िलहाल हाथ में है, उसे नज़रअंदाज़ करके…
जो औक़ात से बाहर है, उसके पीछे पड़ते हैं…
फ़िर मुद्दतें होंती हैं यूंही इंतज़ार करते-करतें…
घर में रहनेवाले लोग अजनबी लगने लगतें हैं…
सबकुछ होते हुए भी, चमन उजड़ से जाते हैं…
मन-के-आसमान में, काले बादल छा जाते हैं…
हम थकते भी नहीं ख़िज़ाँ को इल्ज़ाम देते-देते…
जब की बहारों ने ही यहां काम तमाम किया है…
जज़्बातों को सीने में दबाएं झूठ-मूठ हंसते हैं…
आहें भरते हुएं, सांस लेते हुए दिन ढकेलते हैं…
जब समझते है 'जीवन चार-दिन की चांदनी है'…
उसे हंसते हुए स्वीकारने में ही सबकी भलाई है…
वक़्त-के-पहिये में बहती है समय की ऐसी धारा,
पल-पल वो कहती है ज़िन्दगी मिलेगी ना दोबारा…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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