
🌷हर धड़कन में बसें तुम ही हों...
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
खेतों की हरियाली में तुम हों...
गाँवों की खुशहाली में तुम हो...
बंद जहाँ होते दुःख-दर्द सारे,
उस ताले की चाभी तुम ही हों...
जाने किसी भी जहां में रह लूं
सब मंगल करने के लिये तुम हों…
जब जब बीजें बोयी खेतों में,
फ़सलों के रूप में तुम ही हो...
शहरों में गांवों में, हर ज़र्रे में...
नज़र आतें, बस तुम ही तुम हो...
झूलोंवाला सुख-सावन तुम हों...
अमुवे वाली डाली भी तुम ही हों...
क्यूं ये पलकें हो जाती हैं नम,
वो बेहद कृपालु एक तुम ही हों...
सब बागों के माली एक ही तुम,
जहां तुम हो, फ़िर काहे का ग़म ?
संसार के कण-कण में है व्याप्त
इन्सानियत बचाने में हो पर्याप्त...
कैसे कोई भक्ति में लीन न हों ?
हर धड़कन में बसें एक तुम ही हों...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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