🌷शिकवा…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
हर इन्सान काफ़ी कुछ सोचता रहता है
पर वर्तमान छोड़े समय पर काबू कहां है…
रौशनी अगर गुरेज़ाँ हुई तो शिकवा कैसे
चांद अगर छिपा हुआ, रात गुज़रेगी कैसे…
कोई हों अज़ीज़, दिल के बहुत ही क़रीब
नाराज़ होने से भी होती है सिर्फ तकलीफ…
अगर ढ़ेर सारी बातें करते रहेंगे तो हैरानी
अगर ख़ामोश हो जातें, तो फ़िर ख़ैर नहीं…
कैसे समझाएंगे, कोई करें तो भी क्या करें
जब ख़ामोशी भी शिकायत सी लगने लगें…
यूं तो मौसम बदलने में वक़्त लगता कहां है
एक पल मुहब्बत दूसरे पल बेरुखी होती है…
बारिश का सही अनुमान लगाया जा सकेगा
पर आंखों से बरसात होगी तो क्या करिएगा…
ख़ुद ही से शिकवा करते थक से गएं है अब
मिन्नतें करने वाले ना जाने किधर गएं हैं सब…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆
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