
🌷 वो सफ़र ज़ीस्त का…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
ज़ीस्त की हक़ीक़त कैसे बयां करेंगे,
वक़्त-का-पहिया ही गर्दिश करता है…
हरेक दिल चाहता है अना पे काबू हों,
पर हालात ही बेकाबू से करते रहते हैं…
अगर अना की गाँठ ही खोल दी जाएं,
प्यार की महक दूरदूर तक बिख़र जाएं…
मुहब्बत ऐसी जैसे होती बे-सबब चाहत,
प्रीत जो है ही सिर्फ जन्नतों की अमानत…
दिन-रात ख्व़ाब-सा जो पलता है दिलों में,
वो सफ़र ज़ीस्त का यूं ही चलता रहता है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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