
🌷 पतझड़ कईं किस्मों का…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
भीगे पन्नों जैसे दिन पलटते हुए…
कुछ पता नहीं चल पाया क्या है…
सब वक़्त वक़्त की बात होती है…
वो भी क्या दिन हुआ करते थे…
कब सुनहली सी भोर हो जाती…
और कब रंगीन सी शामें कटती…
बिल्कुल भी पता चलता ना था…
घर-आंगन रिश्तों से भरा हुआ…
सगे संबंधियों से यूं सजा हुआ…
हर त्योहार का आनंद दस-गुना
मिल-जुलके बढ़तीं हैं खुशियां…
चाँदनी जैसी चमचमाती हुईं रातें…
वो छुट्टीयों में छत पर मंडराते हुए…
उनके बारे में और क्या-क्या कहें…
दिन दुगने, रात चौगुनी होती थी…
अब तो बस्स वहीं लम्हें यादें बनके…
सीने की असीम गहराई में जिंदा हैं…
सालों साल से आराम फरमा रहे हैं…
हम में-सृष्टि में ज्यादा फर्क नहीं है…
अब जाकर के समझ में आ गया है,
के “पतझड़” कईं किस्म का होता है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆















