कविता : 🌷 ज़िन्दगी अक्सर…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
हों रहा है एक एहसास रह-रह कर,
पूरी कायनात भी है हमारे ही भीतर…
कहीं-न-कहीं तो छुपें हुएं हैं समुन्दर,
ये संवेदना सी लगती है, हमारे अंदर…
ज़िंदगी का सबब ढूंढने जब चल पड़े,
किसी और के काम आना ही ज़ीना है…
पता चला कि ज़ीना तो एक बहाना है
सचमें ज़िंदगी ज़ीना ही जिंदादिली है…
धड़कने तेज सी चलती हैं जब दिलमें…
जन्नत यहीं है जो जीते जी मिलती हमें…
यूं हलचल सी मचाएं किसी की आहटें…
शहनाई बजने लगती है चीर के सन्नाटे…
क्या क्या रंग बिखेरती हैं ये रंगीन शामें…
ज़िन्दगी अक्सर खेलती है, यूं सपनों में…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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