कविता :🌷 " समुंदर प्यासा "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जीवन की ढलतीं हुई रंगीन सी संध्या,
खुशी-खुशी बीतें बस इतनी सी तमन्ना…
अंबर में आधा अधुरा चमकता चंद्रमा,
संग-संग लुक-लुक कर रही चांदनीयां…
किनारे किनारे मंज़र बड़ा ही लुभावना,
दिल का दरिया, खिंचता रहा अनजाना…
लहरोंकी उछलकूद और चांदका आना,
देखते ही देखते नज़ारा हों गया सुहाना…
ज़िंदगीकी किताब लिखनी शुरू कर दी…
रोज़ाना पन्नों-के-बाद पन्ना भरते हुए भी,
हर रोज़ एक-एक पन्ना, पलटता ही रहा…
किताब ख़ाली हो जाने का, डर सा रहा…
मन के भीतर की ख़ामोशियाँ ऐसी ऐसी,
समुंदर को भी सुशांत वो कर दें सकती…
पानी तो उछलना-कूदना तक भूल गया,
खुद समुद्र प्यासा-का-प्यासा ही रह गया…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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