कविता :🌷 " मन की चाँदनी "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
इस ब्रह्मांड में मनुष्य जो जो देख सकता है,
वो सब कुछ भी मौजूद हैं उसके मस्तिष्क में…
जो सूरज हर दिन चमकता रहता है, गगन में
वो सूर्य दमकता रहता है हमारे भाल-प्रदेश में…
रात के अंधेरों में जैसे चंद्रमा लुभा लेता है हमें,
वैसे ही चांद धीमी-धीमी रोशनी फैलाएं, मन में…
भीनी-भीनी खुशियां फैलाएं चांदनी, चारों ओर
दिमाग़ में वहीं है, सितारों से भरी सुंदरसी भोर…
ऐसी मान्यता है, पांच परत-होती है चांदनी की
बिल्कुल जैसी होती है, हमारी ज़िंदगी की भी…
एक है सुहानी सी, जो रोज़ाना नज़र में आएगी
दूजी है पानी के भीतर जो बिम्ब के रुपमें सही…
अगली है जो, खुद जमीन पे उतर के आ जाएं
फ़िर दूसरी जो रातको आकाशमें झिलमिलाएं…
आख़िर की परत, जो मन-में-बसां-दृढ-विश्वास है
जब तक विश्वास कायम है, जीवन आसान सा है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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