कविता :🌷 " ज़िंदगी की परिभाषा "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जीवनमें चलता ही है दौर आशा निराशा का…
ज़िंदगी कभी हंसी-खुशी तो कभी है तमाशा…
कभी खेल कूद है तो कभी हार और हताशा…
लक्ष्य तक लेके जा सकेगी सिर्फ जिजीविषा…
कभी-कभार संघर्ष, कभी हो जीत की आशा…
मानो या, ना मानो यही ज़िंदगी की परिभाषा…
नियति की पहचान होगी तो जी लेंगे शान से
जीवन में बिना झिझके लड़ लेंगे जी-जान से…
गर अश्क फ़लक के नैनों से टपकेंगे तब भी,
जो ठान लिया है हमने एक बार, छोड़ेंगे नहीं…
तन-मन में लगन है सच्ची, कुछ न होता ग़लत
ज़िंदगी अगर संवर सकेंगे, तो वो ही है जन्नत…
कतई नहीं मुकरते सूरज-चांद-सितारे कामसे…
फ़िर हम क्यूं भला कतराएंगे यूं ही ज़िंदगी से…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆
Leave a Reply