कविता :🌷 " खुद की तलाश में "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जन्म से ही उलझे हुए, हम रहते हैं तलाश में
दुनियामें आते हैं अमृत-धाराओं को ढूंढते हुए…
मां बाप से लाड़-प्यार-दुलारादी की तलाश में
दादा-दादी नाना-नानी से मीठी मीठी सी बातें…
फ़िर खेल-कूद पढ़ने -लिखने, ज्ञान बटोरने में
सहेलियों-दोस्तों की नई दुनिया की तलाश में…
यौवनावस्थामें एक जीवन साथीकी तलाश में
फ़िर अच्छी नौकरी या व्यापार की तलाश में…
उसके बाद शादी-ब्याह हो जाने के इंतज़ार में
फ़िर एक अर्सा बीताते हैं घरौंदे की तलाश में…
घर-गृहस्थी शुरू होते ही, बच्चों की तलाश में
फ़िर बच्चों के लिए अच्छी स्कूलकी तलाश में…
देखते-देखते खोजते हुए कहां से कहां पहुंचे हैं
राह खोकर, ठोकरें खाते हैं पर तलाश जारी है…
ज़िंदगी बीत जाती है पर तलाश खत्म ना होती…
सुख को खोजते खोजते इक उम्र यूं बीत जाती…
ख़ाली हाथ आते हैं हम सब, इस क़दर खो जाते…
मन में उम्मीद लिए, स्वयं को तलाश करते करते…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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