कविता :🌷 " वक्त का तकाज़ा " कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
वक्त-वक्त की बात होती है जन्म से लेके हमें चाहिए कि ये बात अच्छेसे समझ लें… किसी भी सूरत में, समय रूकता नही है वो तो अपनी गति से, चलता ही रहता है
हरेक पल वक्तका तकाज़ा होता है, अलग सालों साल बीतते हैं, हम होते नहीं सजग अपनी ही धुनमें बहकते हैं, देखके जगमग तड़पते हैं पानें उस विधाता की इक झलक…
जन्म से लेके आंखोंपे ऐसी पट्टी बांध कर, अच्छे खासे नेत्र होते हुए भी, अंधे बनकर… चेहरे पे चेहरे, नक़ाब पे नक़ाब यूं चढ़ाकर… झूठ-मूठ की हंसी-खुशी झूठे ज़श्न मनाकर…
स्वयं को साथ-ही-साथ जमाने को फंसाकर, एक और ही दुनिया बसानेके बहाने बनाकर… दौड़ते हैं हजारों लाखों कोसों दूर-दूर भागकर जान हथेली पर लेकर, अंदर बाहरसे थककर…
अब रूककर सांस थामकर वापस लौटना है… अपने सपनों की नगरी फ़िरसे खुद बसानी है जब जाग जाएंगे, तब ही सवेरा हो सकता है… वक्त का तकाज़ा ही ज़मीं पर जन्नत लाता है…
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