कविता : 🌷 " बेपनाह प्यार "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
पास-पास रहते हुए भी दोनों हैं कोसों दूर
कहने को तो दो नेत्र हैं, फ़िर भी हैं मजबूर…
प्यार बरकरार रखने, ज़रा सी दूरी चाहिए…
चेहरे के दाएं-बाएं हैं ये मौजूद पर हैं दूर-दूर…
कहने को तो दो कान हैं, पर होते हैं मगरूर
मनमुटाव कभी न हो, ज़रा सी चुप्पी चाहिए…
मिलना-जुलना तो बहुत दूर, दोनों को नामंजूर
एक-दूसरे की सुनते ही नहीं, है किसका कसूर ?
फ़िरभी संतुलन बनाने, ज़रा सी समझ चाहिए…
जितनी चाहे हो जायदाद घर-धनदौलत बेशुमार…
ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पर रहता है इंतज़ार,
चाहिए दिलमें ज़रा सी जगह, साथ बेपनाह प्यार…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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