कविता : 🌷 भरोसा पार लगाएं…
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
ना लगता हों भरोसा जब-जब ज़िन्दगी का…
न जाने मोड़ लें, कब, कहां और कौनसा…
एक ऐसी चीज़ जो है कांच से भी पतली,
धक-धक करते दिल से है नाज़ुक-भली…
लोहे से भी कई गुना अधिक शक्तिशाली,
जान हथेली पे लिए सुरक्षित रखने जैसी…
रिश्तों की डोर भरोसे पे ही कायम टिकें है…
राम ही जाने क्या होगा अगर वो टूट जाएं…
ग़लतीवाला काम है इन्सां का दूसरा नाम…
भरोसा ना तोड़ना गर हाथ लिया हो थाम…
गुज़र गया जो वक्त और टूटा हुआ भरोसा…
कभी भी लौटकर, वापस आ नहीं सकता…
बहती हुई नदी का मीठा पानी अमृत जैसा,
सागरकी आगोशमें जाते ही खारा हो जाता…
किसी पे अंधा भरोसा करने से बेहतर होगा,
अपनी काबिलियत पे ही पूरा भरोसा रखना…
जब गर्म दूध पीने से, मुंह में छालें पड़ जाएं…
तब ठंडी छांस पीने से भी, तन-मन घबराएं…
मुश्किल वक्त तो आता जाता ही रहता है…
स्वयं पर रखा विश्वास ही काम आता है…
जब जब जीवन की कश्ती डगमगाती जाएं,
सिर्फ और सिर्फ भरोसा ही उसे पार लगाएं…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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