
कविता : 🌷 " यूं ही "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
यूं ही चलते हैं…
पर पता नहीं जाना कहां है,
जीवन के सफ़र के हम तो मुसाफ़िर है,
बस्स यूं ही चलते रहेंगे…
यूं ही लिखते हैं…
मालूम ही नहीं है क्या लिखें,
पर और कुछ, जानते भी तो नहीं हैं…
बस्स यूं ही दिल से लिखते रहेंगे…
यूं ही ताक़ते रहते हैं…
दुनिया सुंदरता से भरी-पूरी है…
कायनात इस बात की गवाही देती है
हम तो बस्स सांस थामे निहारते हैं…
यूं ही फंस जाते हैं…
हसीनाओं के ऐसे-ऐसे मेलों में,
उनके नैनों के तीरों से घायल हो के,
हम तो यूं ही जाल में फंसे, परिंदे हैं…
यूं ही तड़पते हैं…
ईश्वरीय शक्ति के दर्शन के लिए…
तड़पते हैं इक झलक पाने के लिए…
बाहर ढूंढते हैं उसे पर वो तो अंदर से,
संवेदनाओं के रूप में नित्य साथ देता है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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