कविता : 🌷 " कुछ ओस की बूँदें... "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जब-जब अनोखी बात, दिल को छू लेती है,
कुछ ओस की बूँदें आंखों से छलक जाती हैं...
पू्रा दिन मजदूरी कर के, ज़मीं पर सोएं हुए
बंदे को देखकर, छलकीं कुछ ओस की बूँदें...
हर सिग्नल पर काम करते या भीख मांगते हुए,
अनाथ बच्चे देखते ख़ूनके आंसू निकल आते हैं...
दूध पीते बच्चों को घर में छोड़ती मजबूर मांएं,
देखकर अपने आप छलकीं कुछ ओस की बूँदें...
हर हालमें बच्चों को पढ़लिखके विदेश भेज दें,
उनका दुलार देख के निकल पड़ी ओस की बूँदें...
वृद्धाश्रम में आख़री दम तक उनकी राह देखते हैं,
खुदगर्ज औलादों से पीड़ित बड़े बूढ़ों को देख के...
कुछ ओस की बूँदें नैनों से अलग हो ही जाती हैं...
जब दुःख के काले बादलों से घिरे होते जीवन में,
जब बिजली सी कड़कें, और फरिश्ता आए बचाने...
आशा की किरण देखते, ओस की बूँदें छलकती हैं...
ज़िन्दगी तान-तनाव में, कभी धूप तो कभी छांव है,
ईश्वरीय संकेत से छलक ही जाती हैं अश्क की बूँदें...
जीवन के हर मोड़ पर रंग लाती दुवाओं को देख के,
एहसास भरीं कुछ ओस की बूँदें निकल ही जाती हैं...
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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