
कविता 🌷 " वो झिलमिल शामें "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
मयुरपंख जैसी वो रंगीन झिलमिल शामें
यादों के समुंदर के पार हाथ-में-हाथ थामे…
दिल के बहुत ही करीब है वो सुनहरे लम्हें
आंखों में आंखें डालकर वो गाई हुई नज़्में…
ढॅ॑लते हुए सूरज का यूं मुस्कुरा के रूकना
मानो पंखों को फैलाकर मयुर का नाचना…
नैनों को सतरंगों की होलीमें यूं भीगों देना
रह-रहकर दिलोंमें उमंगों की बारिश होना…
आसान नहीं, सब भुलाके ज़िंदगी बिताना
सितारों के आंगनमें चांद बनकर मुस्कुराना…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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