कविता 🌷 " वर्ष की इस दहलीज़ पर "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
उम्र की इस बेहतरीन दहलीज़ पे
सब कुछ अपना-सा क्यों लगता है…
जन्म से लेकर हर वक्त पर लम्हें,
कुछ-न-कुछ यूं देते चले आ रहें हैं…
रह-रहके ये बात महसूस होती है,
के कितने नसीबों वाले हम खुद हैं…
दाता ही हर रूप में हमारे साथ है…
जन्म के समय मां-बाप के रूप में…
फ़िर गुरु-शिक्षकों की भूमिका में,
जीवन भर भिन्न मित्रों के रूप में…
फ़िर सुख-दुख बांटने के ही हेतु से,
जीवन-साथी बनकर, साथ निभाने…
जीवन की दहलीज़ पर खड़े होकर
ढूंढते रह गएं कदम, जाना कहां है…
प्रकृति के दहलीज़ पर, बसेरा बनाने
निकल पड़े हैं सब कुछ छोड़-छाड़के…
ईश्वर का निवास है, सांस-सांस में…
चाहे दुनिया महसूस करें या न करें…
उम्र की इस दिलचस्प सी दहलीज़ पे,
इसलिए शुक्रगुजार हैं हम तहे दिल से…
वर्ष की अंतिम दहलीज़ पर ये जाना,
वक्त तो गुजरता है, जीना तो है बहाना…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆
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