
कविता : 🌷 " माना कि…"
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
माना कि हीरा अनमोल होता है
और कांच, सिर्फ कांच ही होती है
पर किमती हिरों के गहने पहनके…
सबसे पहले याद आईने की आतीं है
माना कि ज़िंदगी है कुछ दिनों की
और अनगिनत काम करने है, बाक़ी
पर जिसका हौसला भी होता है बुलंद
रूकता उस के लिए, स्वयं समय भी…
माना कि जीवन में कोई चाहें, न चाहें
ढेरों सुख-दु:ख तो झेलने ही पड़ते हैं…
पर जिसके मन में दया-क्षमा-शान्ति है,
वो कीचड़में खिलें कमल सा अनछुआ है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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