कविता : 🌷 " अनूठा सफ़र "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जो जन्म से शुरू हुआ, यही है ज़िंदगी का सफ़र…
सभी मायनों में पूरा कर दिखाना है होकर निड़र
चाहे मुश्किलोंका डटके सामना क्यूं न करना पड़े
धरती के आँचल को कभी यूं ही ना भिगोते रहेंगे…
कभी सन्नाटों में दिल की बातें ही गूंजने लगे भी,
शोरगुलों में फ़िर भी शांति ही ढूँढ लेंगे कैसे भी…
ये तो तय है, भक्ति बिना जीवन सूना सा बंजर है
सत्य भावनाओं के बिना हरेक रिश्ता ही मंज़र है…
भक्ति से तन-मन को सही ताक़त-हिम्मत मिले है
सत्य भाव से आत्मा की गहराई महसूस होती है…
अधूरी सी दुआ है, सत्य और प्रेम के बिना साधना
कोई गुमराह सी जवानी किसी मासूम सा बचपना…
मोहताज बुढ़ापा और बे रहम ज़ालिम सा जमाना,
ले-दे कर बस्स यही होता है आम-ज़िंदगी का गाना…
कभी ज़िंदगी एक भोर सी है, सूरज के इंतज़ार में
तो कभी ज़िंदगी मायूसी है, ख़ुशियों की तलाश में…
जीवन का ये अनूठा सा सफ़र होता है बेहद सुहाना
हरेक पल इंतज़ार में कैसे ज़िंदगी को सफल बनाना…
माना कि जुदा जुदा है हर एक का ज़िंदगी का सफ़र
कोशिशें यें ही हो कि उसे कैसे दिलचस्प बनाया जाए…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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