कविता :🌷 " फिसलता समय "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
न जाने क्यों भला इतना तरसाती है ये ज़िंदगी,
खुशियों से, सुकून से भरे, हर एक पल के लिए…
ज़िंदगी के दौरान कभी कभी सिर्फ नोट ही नहीं,
मिल ही जाते हैं कुछ इन्सान जाली और नक़ली
भरोसा ही नहीं होता कब कैसे दिन बदल जाएं,
अपनी छाया भी तो साथ नहीं देती है, अंधेरे में
जैसे जैसे बुढ़ापा नजदीक आना, शुरू होता है…
और-तो-और अपनी काया भी साथ नहीं देती है…
जब भी मृत्युका समय समीप आता नज़र आएं,
तो माया भी साथ देने से साफ़ इन्कार करती है…
जाने क्यों दूसरे, फिर भी सदा दूसरे ही रहते हैं…
वो कभी "अपने" बनने की कोशिश नहीं करते…
पानी में तेल मिलाने की चेष्टा कितनी भी करेंगे,
वो दोनों फिर भी अलग अलग ही नजर आएंगे…
अक्सर चीज़े समय पर समझ में, आती नहीं हैं…
जब समझ में आएं, समय फिसल गया होता है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆
Leave a Reply