कविता :🌷 " खेल "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
कभी-कभी लाएं होंठों पर हंसी…
कभी-कभी बहाएं, नैनों से नदी…
सभीसे ज़िंदगी खेलें लुका-छिपी…
आशाएं जगाती हैं उम्मीद मन में…
सुनहली लौ जगा दें, अंग-अंग में…
उमंगें लाएं, नयी चेतना के रूपमें…
ये आशा-निराशा के घने बादल…
किसी किसी को कर देते पागल…
जाने अंजानेमें लोग होतें घायल…
हर बंदेका है कोई-न-कोई झमेला…
दुनिया, अनगिनत लोगों का मेला…
फ़िर भी हर दिल है, बेहद अकेला…
शायद यह परमात्मा का ही है खेल…
कठीन ऐसे, रेतसे निकालना हो तेल…
जिसका पृथ्वीपर न होगा कोई मेल…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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