
कविता :🌷 " मृगतृष्णा "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
सुना तो था, "जैसी करनी वैसी भरनी"…
पर सोचा न था ज़िंदगी बदलेगी इतनी…
बिना सोचे समझे दिन बितते चले गए…
साल के बाद साल यूंही पलटते रह गए…
जब आंखों पे बंधी हुई अहंकार की पट्टी…
किसी कारण वश यकायक से खुल गई,
मानो दिन दहाड़े ही सितारों की रात हुई…
खुदही ने बनाई और बसायीं अंधेर-नगरी…
सब कुछ अच्छा खासा जो चल रहा था,
वो तो बस एक झूठ-मूठ का आभास था…
सच्चाई को पीठ दिखाने का इक बहाना…
या फ़िर अहंकार में चूर चूर हुई मृगतृष्णा…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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