कविता :🌷 " वर्ना "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
कुछ खास बात है उन भोली आंखों में,
वर्ना………
बिना डोर कैसे कोई खिंचा चला जाएं…
इक उम्र बीती चांदसा चेहरा देखे हुएं…
वर्ना………
याद तो बहुत करते हैं हर शाम-सवेरे…
दिलसे अपनों की ही परवाह होती है…
वर्ना………
फ़िक्र तो, खुद की भी नहीं करते हैं…
आग दोनों तरफ बराबर की लगती है…
वर्ना………
कौन बिछाकर बैठेंगे आंखे इंतज़ार में…
हर सागर की कहानी दिलचस्प होगी…
वर्ना………
उसे मिलने न जाती नदियां दौड़ी-दौड़ी…
जब तक चेहरे पे हंसी है, जन्नत होगी…
वर्ना………
अश्कों को तो आंखें भी जगह नहीं देती …
दिल-ही-दिल में प्रेम तो बहुत करते हैं…
वर्ना………
हर रोज़ ख़्वाबों में यूं हाज़िर ही ना होतें…
जो करने है काम, पूरे करेंगे जल्दी-जल्दी…
वर्ना………
दो दिन की ये ज़िन्दगी यूं ही गुज़र जाएगी…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
🙏🕉️🔆
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