कविता : 🌷 " हरेक लम्हा, अनछुआ सा "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
कईं सदियों की यह ख़ामोशी…
मन-ही-मन में रूकी-रूकी सी…
कोई ढूंढ़े और समझे तो सही…
तन्हा दिल से बातें करें तो सही…
कईं सदियोंसे चलती आ रही…
ये मन की गहराई इतनी बड़ी…
कि दरिया या महासागर से भी…
कोई तुलनाएं हो ही ना सकेगी…
वक़्त के हिसाब से ही अब तो…
सोचने-समझने की है जरूरत…
चाहे दुनिया इधर की उधर होवें,
वक़्त किसी केलिए रूकता कहां है ?
जन्म से, लोग अपने होकर भी…
अपनापन छोड़ गैर-अनजान से…
हर एहसास से भी वाकिफ़ होंके…
हरेक लम्हा नया अनछुआ सा है…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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