कविता :🌷 " बहता-पानी "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
चाहे नैनों से बहें या बड़े-बड़े झरनों से…
पानी जीवन होके भी पानी ही होता है…
जब हृदय पिघलता है आंखोंसे है बहता…
जब सृष्टि मचलती है, सावन है बरसता…
यूं ही संवर जाएगी अपनी भी जिंदगानी
अलग नसीब पर सबकी एकसी कहानी…
अपनी परछाई कभी साथ नहीं छोड़ती…
कभी आगे-या-पीछे कभी पैरों तले होगी…
जन्म से वो आंखोंके सामने होते हुए भी
हाथों की लकीरें समझ में ही नहीं आतीं…
अपनी-अपनी सूरतें बदल जाती हैं इतनी,
आसानी से पहचानी भी नहीं जा सकती…
कस्में-वादें, बातें-मुलाकातें हैं एक जरिया…
मकसद हो सहीं तो क्या पानी क्या दरिया…
सदियों से चलती रही है जवानी की रवानी,
ज़िंदगी हों ऐसी जैसे झरनों से बहता पानी…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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