कविता :🌷 " चंद्रमा तो है एक बहाना "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
शरद पूर्णिमा की रात शीतल सी चाँदनी
ठंडी-ठंडी पूरवैया, चलती है भिनी-भिनी…
चंद्रमा की छबी खिलीं, लगती मनभावनी
लम्हां-लम्हां लगें वो भीगी-भीगीसी सुहानी
ऐसा सुंदर समां बांध कर, मन को चुराये
मीठी-मीठीसी महक ऐसी दिलको लुभाये…
झूम रहा प्यारा चंदा, चाँदनीके संग नभमें
हलके से पानी लहराये, खुशी से झील में…
ज़मीं पर हर्ष से झूम उठे हैं तन-मन सारे,
मानो आस्मां से उतरके आएं सारे सितारें…
गुमसुम सी रात, नटखट चाँद बादलों में
बेहतरीन आनंद छुपा सृष्टि के नजारों में…
छिप-छिपकर वो आवारा यूँ ही मुस्कुराये
रैना का समां सुहाना नैन बावरे तरस गएं…
साजन के लिए, चंद्रमा तो है एक बहाना
प्यासें मन की आशा है सजनी से मिलना…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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