कविता : 🌷 " अनूठा सफ़र "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
जन्म से शुरू हो जाता है अपना ज़िंदगी का सफ़र…
सभी मायनों में पूरा कर दिखाना होगा होके निड़र…
कोई गुमराह सी जवानी, किसी का मासूम बचपना…
अधूरी सी दुआ होगी सत्य और प्रेम बिना, साधना…
कभी मोहताज सा बुढ़ापा, बे रहम ज़ालिम जमाना…
ले-दे कर बस्स यही होता है, आम-ज़िंदगी का गाना…
कभी ज़िंदगी एक भोर जैसी है, सूरज के इंतज़ार में
फ़िर कभी ज़िंदगी मायूसी है, ख़ुशियों की तलाश में…
जीवन का ये अनूठा सा सफ़र होता बेहद ही सुहाना,
हर एक पल कोशिश में ज़िंदगी को सफल है बनाना…
कभी जीवन का सफ़र पिंजड़े सा जकड़ लेता हुआ,
तो कभी खुशियों की लहरों में पंछी बना उड़ता हुआ…
कभी दलदल में फंसे जानवरों जैसा है लाचार होता,
फ़िर कभी कीचड़ में से कमल जैसा खिलकर उठता…
ज़िंदगी का सफ़र कभी झरनों जैसा खुद बहनेवाला,
पर कभी बहना भूलें, बन जाता है छिछला सा गड्ढा…
कभी है ऐसा सफ़र जो चोर-रेत जैसा फिसलता हुआ,
कभी वो ही चट्टानों जैसा मजबूत, स्थिर संभला हुआ…
कभी ख़त्म न होनेवाली अमावस की रात जैसा सफ़र,
फ़िर कभी पूनम के चन्द्रमा जैसा दमकता हुआ अंबर…
चाहे पड़े कितनी भी मुश्किलों का डटके सामना करना,
सच्ची लगन से यह अनूठा सा सफ़र, तय है पूरा करना…
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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