कविता :🌷 " अक्सर देखा है "
कवयित्री : तिलोत्तमा विजय लेले
मासूम बचपन-चंचल जवानी से बूढ़ापें तक
हम उन सब चीजों को अक्सर खो ही देतें हैं,
जो जी-जानसे सम्हाले सीनेसे लगाए रखतें हैं
अक्सर दोस्त और दोस्तीकी सारी क़समें रस्में,
किसी मामूली सी बेतुकी बात पर अटकती है
कभी बिखर न जाएं यारीके मोतियों-जैसे-लम्हें
अक्सर देखा है रिश्ता हकीकत का ख़्वाबों से
साथ ऐसा हों, जैसे दिन का होता है रजनी से
एक दूजे के लिए जान तक देने के, क़स्में-वादें
जुनून ऐसा हो कि भूख-प्यास तक भुला ही दें
अक्सर प्रेरित करता है, साथ आस्मांका जमींसे
चाहे आंधी आये या फ़िर तुफान वे नहीं बदलेंगे
अक्सर जवां दिलों की ख्वाहिशें पूरी हो जाती,
गर बेइंतहा प्यार में डूब जाने की तैयारी है पूरी
फ़िर चाहे इधर की उधर हों जाएं दुनिया सारी
दिलसे रिश्ता ऐसा हों जैसे चंद्रमा का चांदनीसे
समय कैसा भी हों दुःखको कोसों दूर भगा देंगे
अक्सर लुकाछिपी खेलते हुए मन को लुभाएंगे
आमतौर पे लोग, सचपर यक़ीन ही नहीं करतें
झूठी-मुठी बातों पे विश्वास आसानीसे करतें हैं
अक्सर सच्चाई को ही इम्तिहान देना पड़ता है
कितने भी सितम जमाना करने की चेष्टा करें,
जो दिल में बस जाएं, अक्सर याद आते ही हैं
आख़री दम तक वो भुलाने से, भूलते कहां हैं…?
अक्सर देखा है रिश्ता, प्रकृति का ज़िन्दगी से…
ऐतबार ऐसा हो के पूरी कायनात साथ चल पड़ें
जो बादल गरजतें हैं, वो बरसातें लाते कहां हैं…?
🌷@तिलोत्तमा विजय लेले
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